लाभ से लालच उत्पन्न होना ही दुखों का कारण है । Labh se Lalach utpanna hona Hi dukho ka Kaaran hai

लोभ, समस्त दोषों की खान है, गुणों को भक्षण करने वाला राक्षस है। सब व्यसन रूपी लता का मूल है और सभी प्रकार के अर्थ की प्राप्ति में बाधक होने वाला है। धन के लोभी मनुष्य की स्थिति बताते हुए स्थानांग सूत्र के टीकाकार कहते हैं –
जो मनुष्य धन का लोभी होता है वह वनों में घूमता है, पर्वतों पर चढ़ता है, समुद्र यात्रा करता है, पर्वत की गुफाओं में भटकता है और भाई को मार डालता है। लोभ के वशीभूत होकर सर्वत्र भटकता है और भार को ढोता है, भूख प्यास को सहन करता है। पापाचरण करने में संकोच नहीं करता है लोभ में आसक्त और धृष्ट – निर्लज्ज बना हुआ कुल, शील सदाचार और जाति मर्यादा को भी छोड़ देता है।
जिस प्रकार समस्त पापों में हिंसा, समस्त कर्मों में मुथ्यात्व और सभी रोगों में राज्य क्षमा बड़े हैं, उसी प्रकार सभी कषायों में लोभ कषाय बडी है। इस पृथ्वी पर लोभ का एक छत्र साम्राज्य है। बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय,चउरिन्द्रिय और प्राणी अपने पूर्व भव में जमीन में गड़े हुए धन पर मूर्छित होकर बैठते हैं।
सांप और छिपकली जैसे पंचेइंद्रिय जीव भी लोभ से अपने पूर्व भव के अथवा दूसरे के रखे हुए धन वाली भूमि पर आकर लीन हो जाते हैं।
पिशाच, भूत, प्रेत और यक्ष आदि देव भी लोभ के वश होकर अपने या दूसरों के निधान पर स्थान जमा कर अधिकार करते हैं।
आभूषण, उद्यान और वापिका आदि में मूर्छित देव भी वहां से च्यव कर पृथ्वी, पानी, वनस्पति में उत्पन्न होते हैं।
जो मुनि महात्मा को क्रोधादी कषाय पर विजय पाकर उपशंत मोह नामक 11वें गुणस्थान पर आरूढ़ हो जाते हैं। वे भी एक लोभ के अंश मात्र से पतित हो जाते हैं। थोड़े से धन के लोभ से दो सहोदर भाई कुत्ते के समान आपस में लड़ते हैं। ग्राम्यजन, अधिकारी वर्ग और शासक, खेत, गांव और राज्य की सीमा के लोभ से पारस्परिक सौहार्द भाव को छोड़कर एक दूसरे से बैर रखते हैं।
दूसरे खड्डे को पूरने से भर जाते हैं किंतु लोभ का खड्डा इतना गहरा और विचित्र है कि इसे जितना भरा जाए उतना ही अधिक गहरा हो जाता है।
निर्धन व्यक्ति सौ सिक्कों का लोभी है तो सौ वाला हजार चाहता है। हजार वाला लाख, लखपति कोट्याधिपति होना चाहता है तो कोट्याधिपति, राज्याधिपति होने की आकांक्षा रखता है और राज्याधिपति चक्रवर्ती सम्राट बनने की तृष्णा रखता है। इंद्र हो जाने पर भी इच्छा की पूर्ति नहीं होती। इस प्रकार लोभ की संतति उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाती है।
समुद्र में ऊपर से जल डालने से वह परिपूर्ण नहीं होता कदाचित देवयोग या अन्य कारण से समुद्र भी परिपूर्ण रूप से भर जाए किंतु लोभ रूपी महासागर तो ऐसा है कि तीन लोक का राज्य भी मिल जाए तो भी पूरा नहीं होता।
धन धान्यादी से भरा हुआ परिपूर्ण यह लोक यदि कोई सुरेंद्र आदि एक ही व्यक्ति को दे दे तो उससे भी वह आत्मा संतुष्ट नहीं होता है। इस प्रकार लोभी आत्मा का तृप्त होना अति ही कठिन है।
ज़र्रों – ज्यों लाभ होता जाता है त्यों – त्यों लोभ बढ़ता जाता है, लाभ से लोभ की वृद्धि होती है।मनुष्य का मन ही ऐसा है कि वह न कभी तृप्त हुआ है और ना कभी होगा। कबीरदास जी कहते हैं कि – कबीरा औंधी खोपड़ी,
कबहु धापे नाय ।
तीन लोक की संपदा,
जो आवै घर माय ।।
मन मरा माया मरी,
मर मर गया शरीर ।
आशा तृष्णा ना मरी,
कह गए दास कबीर ।।
लोभ से दोनों लोक में कष्ट होता है। अतः समस्त शास्त्रों का सार यही है कि बुद्धिमान मनुष्य लोभ को त्यागने का ही प्रयत्न करें। ज्ञानीजन फरमाते हैं कि जिसके हृदय में सुमति का निवास होता है, वह लोभ रूपी महासागर की चारों और फैलती हुई प्रचंड तरंगों पर संतोष का सेतु बांध कर रोक देता है।