सेवा ही सत्ता, समृद्धि और संपत्ति को आकर्षित करने वाला वशीकरण मंत्र है। Seva hi satta, samriddhi aur sampatti ko akarshit karne wala vashikaran mantra hai.

सत्ता शब्द ‘ सत् ‘ से बना है। भाषा शास्त्र की दृष्टि से सत्य और सत्ता एक ही अर्थ को बताने वाले पर्याय हैं। परंतु आजकल सत्ता शब्द जिस अर्थ में प्रचलित हुआ है और जिस रूढ व्यवहार में आ रहा है उस पर से यह कहा जा सकता है कि सत्य और सत्ता में सचमुच प्रकाश और अंधकार जितना अंतर होता जा रहा है। सत्य को असत्य और अज्ञान – मिथ्यावाद से उतना खतरा नही है जितना सत्ता से है। सत्य आज सत्ता द्वारा आक्रांत है, यह बात किसी तटस्थ दर्शी से छिपी नहीं रह सकती।
यद्यपि ‘अंत में विजय तो सत्य की होती है ‘ यह सुभाषित आज भी प्रचलित है, परंतु इस विश्वास और श्रद्धा के साथ सब प्रतीक्षा करके निर्णय करने वाले नहीं होते। बड़े-बड़े असत्य, सफेद झूठ, षड्यंत्र, छल – प्रपंच आदि खुले रुप में सत्य के नाम पर सत्ता द्वारा चलाए जा रहे हैं। असत्य में यह शक्ति नहीं है कि वह खुले रुप में सत्य के सामने टिक सके या प्रतिस्पर्धा में उतर सके। सत्ता में ऐसी शक्ति है कि वह सत्य, नीति धर्म और प्रामाणिकता आदि तत्वों को चुनौती दे सकती है, जो आज हमें प्रत्यक्ष रुप से दिखाई पड़ रहा है।
अभी – अभी सारे देश में सत्ता ने एक नई चाल चलना शुरू किया है। अब वह सेवा के नाम पर अपनी दुकानदारी चला रही है। अब तक सत्ता ने सत्य के विरुद्ध विद्रोह किया, अब वह सेवा के सामने बगावत करने पर तुल रही है। जिन्होंने अपने जीवन में कभी सेवा को छुआ तक नहीं, जिन्होंने सेवा के लिए तनिक भी आत्मभोग नहीं दिया वे लोग सेवा करने के लिए सत्ता पर टूट पढ़ रहे हैं।
कभी-कभी विचार आता है कि “सेवा के लिए सत्ता प्राप्त करना क्या जरूरी है ? जिसे सेवा करनी है उसे सत्ता की क्या आवश्यकता है ? सत्य तो यह है कि सत्ता पर रहकर सेवा करने की अपेक्षा, सत्ता पर ना रहने से अधिक सेवा हो सकती है।
सेवक में प्रथम गुण सेवा का होना चाहिए। सत्ता पाने के बाद शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसमें नम्रता कायम रहे। जो सही रूप में सेवा का अभिलाषी हो उसे स्वार्थ – त्याग, सदाचार, संयम, धर्म, सहिष्णुता, गंभीरता, समभाव, सत्य, प्रामाणिकता आदि गुणों को अपने जीवन में उतारना पड़ता है। परंतु सत्ता की कुर्सी ऐसी है कि सेवा की डींग हांकने वाले उस पर बैठकर एकदम बदल जाते हैं ।
भारत जैसे प्राचीन आर्य संस्कृति को मानने वाले देश में सेवा की सच्ची तमन्ना और भावना जागृत होनी चाहिए। यही देश समाज और संस्कृति के लिए गौरव की बात है। सत्ता के लिए आकाश – पाताल एक करना, धमाल – दौड़ धूप और षड्यंत्र करना कदापि वांछनीय नहीं है।
भारत के प्रत्येक व्यक्ति को अपने – अपने क्षेत्र में अधिकार की मर्यादा में रहकर वास्तविक स्वार्थ त्याग पूर्वक सेवा के कार्य में अपनी शक्ति लगानी चाहिए। सेवा ही सत्ता, समृद्धि और संपत्ति को आकर्षित करने वाला वशीकरण मंत्र है। परंतु तन- मन- धन से स्वार्थ – निरपेक्ष रहकर सच्ची सेवा करने की तमन्ना होनी चाहिए।
आज स्वतंत्र भारत को आवश्यकता है – सच्चे सेवकों की जिन्हें सत्ता की अपेक्षा सेवा अधिक पसंद हो और जो सेवा के लिए सत्ता के सिंहासन को छणभर में लात मारने के लिए तैयार हो।