पैसे का नाम भले “अर्थ” है पर अनेक अनर्थो का मूल यही है paise ka naam bhale arth hai per anek anartho ka mul yahi hai

युवक का नाम ” अर्जुन ” हो और कुत्ते के भौंकने की आवाज सुनते ही वह भाग खड़ा होता हो ऐसा हो सकता है।
बच्चे का नाम ” भीम “ हो और बात – बात में वह रोने लगता हो ऐसा हो सकता है।
बस इसी तर्ज पर पैसे का नाम भले ” अर्थ ” हो पर दुनियाभर के अनर्थ सर्जित करने की उसमें पाशवी ताकत है इसमें कोई संदेह नहीं है।
हालांकि,
प्रश्न मन में यह आता है कि अर्थ अनर्थो का ही कारण है या सार्थकता का भी कारण है। जैसे जहर मृत्यु का ही कारण बनता है
वैसे अर्थ क्या पापों का कारण ही बनता है ?
इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जिसके पास पैसा आता है उसकी बुद्धि को प्राय: नष्ट किए बिना नहीं रहता। और भ्रष्ट बुद्धि वाला अनर्थकारी प्रवृत्तियों में प्रवृत्त हुए बिना नहीं रहता है। इसी कारण अर्थ को  “अनर्थो का मूल ” यह कलंक लगा हुआ है।
जवाब दो –
पैसे बढ़ने के बाद प्रसन्नता बढ़ती है या उद्विग्नता  ?
मित्र बढ़ते हैं या दुश्मन ?
निर्भयता बढ़ती है या भयभीतता ?
सरलता बढ़ती है या छल – कपट ?
प्रेम बढ़ता है या द्वेष ?
इन समस्त प्रश्नों का एक ही वाक्य में उत्तर देना तो यह कहा जा सकता है कि पैसे बढ़ने के बाद जीवन में सद्गुण घटते हैं,
दुर्गुण बढ़ते हैं।
सदाचार घटता है, दुष्टचार बढ़ता है। विश्वास घटता है, संदेह बढ़ता है।
पर, जैसे यह सच है कि पैसे की अधिकता में सद्गुण नहीं टिकते वैसे यह भी सच है कि पैसे के अभाव में समाधि नहीं टिकती।
फिर क्या किया जाए ?
एक ही उपाय है –
विवेक को उपस्थित रखो।
गेहूं की कोठी में डाला जाने वाला पारा जैसे गेहूं को सड़ने नहीं देता वैसे ही मन में प्रतिष्ठित हो जाने वाला विवेक पैसे की अधिकता के बावजूद जीवन को सड़ने नहीं देगा।
एक छोटा सा तिनका न बुझाई जाने जा सके ऐसी आग फैला सकता है।
विवेक बिना की थोड़ी संपत्ति भी जीवन में कल्पनातीत हाहाकार का सर्जन कर सकती है।

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