लंका विजय अभियान में सबसे बड़ा सहयोग तुम्हारा है Lanka Vijay abhiyan mein sabse bada Sahyog tumhara hai

आप छोटे बच्चे हैं तो भी चिंता ना करें, अगर आप निर्धन है तब भी फिक्र ना करें – जिस तरह भी आप औरों के काम आ सकते हैं आने की कोशिश करें।
मुझे याद है –
श्री राम ने लंका – विजय – अभियान प्रारंभ किया। समुद्र पार करने के लिए समुद्र पर पत्थरों का पुल बनाना शुरू हुआ। पत्थर पर पत्थर लगाए जा रहे थे कि तभी राम ने देखा एक गिलहरी पानी में जाती है, फिर मिट्टी पर आती है और फिर पत्थरों के बीच जाती है। वापस आती है और फिर पानी में जाती है, मिट्टी पर आती है और फिर पत्थरों के बीच चली जाती है। वह बार-बार लगातार यही किए जा रही थी। राम ने सोचा, आखिरी यह  गिलहरी कर क्या रही है। उन्होंने हनुमान से कहा, इस गिलहरी को पकड़कर लाओ तो। हनुमान गिलहरी को पकड़ लाए और राम के हाथ में दे दी।
राम ने गिलहरी से पूछा, ‘तुम यह बार-बार क्या कर रही हो। मैं समझ नहीं पा रहा हूं। तुम पानी में जाती हो, फिर मिट्टी में लोटपोट होती हो, पत्थरों के बीच जाती हो और कुछ करके वापस आ जाती हो।’ इस पर उसने कहा, ‘भगवान मैंने सोचा, सती सीता की रक्षा के लिए, उसकी आन – बान और शान रखने के लिए आप लंका पर युद्ध के लिए जा रहे हैं, वानरों की सेना आपके साथ, युद्ध में सहयोगी बन रही है तो मैंने सोचा मैं भी सहयोगी बनूं। मेरे पास और तो कुछ सहयोग करने को नहीं था क्योंकि इन पत्थरों को उठाने की क्षमता तो मुझ में नहीं है तो मैंने सोचा कि इन पत्थरों के बीच जो खाली जगह है उसे मिट्टी डाल – डालकर भर दूं, ताकि जब आप सेना सहित इस पर थे गुजरे तो ये पत्थर आपको न चुभें।’
भगवान श्रीराम ने कहा, ‘गिलहरी, तू महान है, पर एक बात तो बता। यहां तो इतनी बड़ी सेना है और तू छोटी सी बार-बार आ जा रही है, अगर किसी के पांव के नीचे आकर मर गई तो।’ गिलहरी ने कहा, ‘प्रभु !  तब तो मैं यह सोचूंगी की नारी जाति के शील और धर्म को बचाने के लिए जो युद्ध लड़ा गया उसमें सबसे पहले मैं काम आई।’ तब राम ने गिलहरी की पीठ पर स्नेह से, प्रेम और वात्सल्य से भरकर अंगुलियां चलाई और कहा ‘लंका – विजय अभियान में सबसे बड़ा सहयोग तुम्हारा है।’
तुम छोटे हो तो यह मत सोचो कि तुम कुछ नहीं कर सकते। जो तुम्हारे हैसियत है तुम उतना तो करो। जो औरों के वक्त – बेवक्त में काम आता है उनका वक्त बेवक्त और बुरा नहीं होता है, जो दूसरों के लिए अपनी आहुति देता है। ईश्वर के घर से उसके लिए आहूतियां समर्पित होती हैं। ये वे बातें जिन्हें मैंने अपनी ओर से आपको समर्पित की है। यह बातें जीवन के लिए, जीवन के विकास के लिए, सुख के लिए सहज उपयोगी है।

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