घने अंधेरे में भी एक उम्मीद की किरण जरूर होती है। Ghane andhere mein Bhi ek ummid ki Kiran jarur hoti hai.

दो राजाओं में युद्ध हुआ। विजयी राजा ने हारे हुए राजा के किले को घेर लिया और उसके सभी विश्वासपात्र अधिकारियों को बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया।

उन कैदियों में पराजित राजा का युवा मंत्री और उसकी पत्नी भी थे। दोनों को किले के एक विशेष हिस्से में कैद कर रखा गया था। कैदखाने के दरोगा ने उन्हें आकर समझाया कि हमारे राजा की गुलामी स्वीकार कर लो नहीं तो कैद में ही भूखे-प्यासे तड़प-तड़पकर मर जाओगे। किन्तु स्वाभिमानी मंत्री को गुलामी स्वीकार नहीं थी , इसलिए चुप रहा। दरोगा चला गया।

इन दोनों को जिस भवन में रखा गया था , उसमें सौ दरवाजे थे। सभी दरवाजों पर बड़े-बड़े ताले लगे हुए थे। मंत्री की पत्नी का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था और वह बहुत घबरा गई थी , किन्तु मंत्री शांत था। उसने पत्नी को दिलासा देते हुए कहा – निराश मत हो। गहरे अंधकार में भी रोशनी की एक किरण अवश्य होती है। ऐसा कहकर वह एक – एक दरवाजे को धकेलकर देखने लगा। दरवाजा नहीं खुला। लगभग बीस-पच्चीस दरवाजे देखे , किन्तु कोई भी दरवाजा नहीं खुला।

                           मंत्री थक गया और उसकी पत्नी की निराशा बढ़ती गई। वह बोली – तुम्हारा दिमाग तो ठीक है ? इतने बड़े-बड़े ताले लगे हैं , भला तुम्हारे धक्कों से वे दरवाजे कैसे खुलेंगे ? किन्तु मंत्री हताश नहीं हुआ और वह उसी लगन से दरवाजों को धकेलता रहा। उसने निन्यानवें दरवाजे धकेले , किन्तु एक भी नहीं खुला।

पत्नी ने चिढ़कर उसे बैठा दिया। किन्तु थोड़ी देर बाद वह पुनः खड़ा हुआ और सौवें दरवाजे को धक्का दिया। धक्का देते ही उसकी चूलें चरमराई। मंत्री को अनुमान हो गया कि यह दरवाजा खुल सकता है। उसने दुगने उत्साह से दरवाजे को धक्का देना शुरू किया और थोड़ी देर में वह खुल गया।

मंत्री ने शांत भाव से जवाब दिया – इसलिए कि जिंदगी में कभी सारे दरवाजे बंद नहीं हुआ करते। उस दरवाजे से निकलकर मंत्री और उसकी पत्नी ने कैद से आजादी पा ली।
जो धैर्य  के साथ आगे बढ़ता जाता है , जीत उसकी ही होती है।

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