आदर्श और मर्यादा की रक्षा करना ही सर्वश्रेष्ठ मानवता का प्रतीक है। Aadarsh aur maryada ki Raksha karna hi sarvshreshth manavta Ka Pratik hai.

शुक्राचार्य के पास जाकर कच संजीवनी विद्या का अध्ययन करने लगा। आचार्य ने छात्र को पुत्रवत् पाला और सांगोपांग ज्ञान देने में कोई कमी न रखी।

आचार्य की कन्या देवयानी कच के साथ ही पढ़ती थी। बहुत दिन साथ – साथ रहते – रहते स्नेह सौजन्य भी दोनों में बहुत बढ़ गया था। अध्ययन पूरा करके कच जब चलने लगा तो देवयानी ने उसकी जीवन सहचरी बनने की अभ्यर्थना की। कच इस प्रस्ताव को सुनकर अवाक् रह गया। वह देवयानी से भरपूर प्रेम करता था , पर प्रेम का अर्थ दाम्पत्य संबंध में ही परिणत होना चाहिए , यह बात उसकी समझ में कभी भी न आई थी। गुरु कन्या सगी बहिन की तरह होती है। उसने सदा यही जाना और माना था। इस मान्यता को बदलने का कोई कारण भी उसे प्रतीत नहीं होता था।

कच ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। देवयानी की आकांक्षाओं पर तुषारापात हुआ तो वह तिलमिला गई , उसने शाप दिया कि मेरे पिता से जो कुछ तुमने पढ़ा है सो निष्फल जाएगा।

इतने दिन के श्रम के अध्ययन के निष्फल चले जाने पर भी कच विचलित न हुआ वरन उसके अक्षरों पर संतोष की एक लहर दौड़ गई। छात्र ने गुरु और गुरु कन्या का साष्टांग अभिनंदन करते हुए कहा – आदर्शों और मर्यादाओं की रक्षा आवश्यक है। इसके लिए किसी व्यक्ति का अहित होता है तो उसमें चिंता की कोई बात नहीं। मेरा अध्ययन निष्फल जाना और देवयानी को इच्छित पति न मिलना। निश्चय की कष्टकारक है। इस दुखांत प्रकरण में हममें से कोई प्रसन्न नहीं। पर मनुष्य की प्रसन्नता तुच्छ है। आदर्शों की रक्षा के लिए आकांक्षाओं का बलिदान होता हो तो उसे सुखांत प्रक्रिया की तरह सहन किया जाना चाहिए। ’’

शुक्राचार्य की आँखें भर आईं। कच भी भारी हृदय लेकर वापस लौटा। देवयानी का तो हृदय ही टूटा जा रहा था। तीनों ही अपना पराभव अनुभव कर रहे थे। पर मर्यादा को जीतती देखकर तीनों की अंतरात्मा एक हलका सा संतोष अनुभव कर रही थी।

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