धर्म कार्य कब करना ? आज… आज… और… अभी dharm karya kab karna ? aaj… aaj… aur… abhi

एक राजा था , उसकी एक रानी , एक पुत्री और एक दासी थी । जैनधर्म के रंग (प्रभाव) में रंगा यह पूरा परिवार वैरागी था , यहाँ तक कि दासी भी वैराग्य में जागृत थी ।

एक बार किसी प्रसंग पर राजा वैराग्य पूर्वक कहता है कि – ” हे जीव ! तू शीघ्र ही धर्म – साधना कर ले । यह जीवन तो क्षणभंगुर है । दो-चार दिन का ही है । इसका क्या भरोसा ? “

उसी समय रानी बोली – ” महाराज ! आप भूल कर रहे हैं ! क्योंकि दो – चार दिन का भी क्या भरोसा ? रात को हँसते हुए सोते हैं और सुबह को जीवन – लीला ही समाप्त हो जाती है , इसलिए कल के भरोसे नहीं रहना चाहिए । “

उसी समय पुत्री गंभीरता से कहती है – ” पिताजी और माताजी ! आप दोनों भूल कर रहे हैं । दो – चार दिन या सुबह – शाम का भी क्या भरोसा ? आँख की एक पलक झपकने में ही कौन जाने क्या हो जाये ? “

दासी भी वहीं खड़ी – खड़ी यह धर्म – चर्चा सुन रही थी , अन्त में वह भी कहती है – ” अरे , आप सब भूल कर रहे हैं । आँख के झपकने में तो कितना समय (अन्तर्मुहूर्त ) चला जाता है …. इतने समय का भी क्या भरोसा ? हमें दूसरे समय की भी राह देखे बिना वर्तमान समय में ही अपनी आत्मा को समझकर आत्महित में सावधान होना चाहिए । आत्महित का काम दूसरे समय पर नहीं छोड़ना चाहिए । एक समय का भी विलम्ब करना योग्य नहीं है । “

इस छोटी सी कहानी से यह शिक्षा लेना चाहिए कि – आत्मसाधना कब करना ? आज…आज…और…अभी ।

4 विचार “धर्म कार्य कब करना ? आज… आज… और… अभी dharm karya kab karna ? aaj… aaj… aur… abhi&rdquo पर;

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