हमें जो अधिकार मिले हैं उन्हें अपना कर्तव्य समझकर पालन करें। Hamen Jo adhikar mile hain unhen apna kartavya samajhkar palan Karen.

दया , करुणा , प्रेम , वात्सल्य  , धर्म का एक स्वरूप है।
ईश्वर की प्रतिष्ठा मन मंदिर में तब ही होगी
  –   जब हमारे हृदय में दया , करुणा , प्रेम एवं वात्सल्य का वास होगा।
संत तुलसीदास जी ने मानस चिंतन कर लिखा –
     दया धर्म का मूल है ,पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छोड़िये,जब लग घट में प्राण।
अहिंसा परमो धर्म –  हिंसा के आगे ‘ आ ‘ लगा दो तो अहिंसा शब्द बना।
अभिमान से जुड़े हृदय में हिंसा उत्पन्न होती है जो स्थूल हिंसा से भी ज्यादा खतरनाक है।
धर्मस्थलों में अभिमान की लड़ाई  चलती है तो वे धर्मस्थल दूषित हो जाते हैं।
भरत चक्रवर्ती इस युग के प्रथम राजपूत्र थै
–  चक्रवर्ती दिग्विजय कर तमिस्त्रा गुफा में अपना नाम लिखने पहुंचे भरतजी के मन में चक्रवर्ती होने का गर्व था। गुफा में जाकर देखा उनसे पहले कई चक्रवर्ती अपना नाम इतिहास में दर्ज करा चुके थे। वहां कोई भी स्थान खाली नहीं था , यह देख वो स्थान ढूंढने लगे । तभी गुफारक्षक देव ने उपस्थित होकर भरतजी से कहा किसी का नाम मिटा दो और खाली जगह पर अपना नाम लिख दो।
भरतजी ने कहा ऐसा कैसे हो सकता है ? देव ने कहा –
  ऐसे ही होता चला आया है। तुम से पहले इस धरती पर अनेकों चक्रवर्ती राजा हो गये हैं । तुम कोई मात्र पहले चक्रवर्ती शक्ति संपन्न राजा नहीं हो।
नाम है वही नाश है।
हमें जो अधिकार मिले हैं उसका हम कर्तव्य – पूर्वक पालन करें , देश , समाज व घर को समभाव से देखें ।
धर्म का मर्म है – समभाव ।
सामायिक की महत्ता समभाव में मन को लगाना है। ईर्ष्या प्रतिस्पर्धा एवं अहंकार से किया गया धर्माचरण एवं आयोजनाएं कभी भी फलदायी नहीं बनती।
धन्य है वह भाग्यशाली जो धर्म के मर्म को समझकर जीव दया का पालन करते हैं।

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