पात्रता होने पर दिक्षा संभव है patrata hone per Diksha sambhav hai

एक बार एक धनी वणिक ने एक महात्मा से दीक्षा देने का अनुरोध किया। साधु ने बात टालने का प्रयत्न किया किंतु वणिक ने पाँव पकड़ लिए। अंत में साधु कुछ समय बाद आकर दीक्षा देने का वचन देकर चला गया।

पाँच पखवारे बाद महात्मा उसी वणिक के द्वार पर आए और भिक्षा के लिए आवाज लगाई। वणिक ने स्वर पहचान लिया और एक से एक बढ़कर पकवानों से थाली सजाकर ले आया। उसे आस थी कि संत इस बार दीक्षा अवश्य देंगे।

साधु ने अपना कमंडल आगे करते हुए कहा कि भोजन इसी में डाल दो। वणिक ने देखा “कमंडल में न जाने कूड़ा – कर्कट आदि क्या – महात्मन् आपका कमंडल तो बहुत गंदा है , उसमें भोजन अशुद्ध एवं अभोज्य हो जाएगा। ’’

साधु ने तुरंत उत्तर दिया – ” कमंडल की गंदगी से जिस प्रकार भोजन अशुद्ध हो जाएगा , इसी प्रकार विषय – विकारों से मलिन अंतःकरण में दीक्षा अशुद्ध हो जाएगी। उसका कोई फल न निकलेगा। ’’

वणिक ने संत का आशय समझकर प्रणाम किया और कहा – ” महाराज मुझे अभी दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। पहले पात्रता उत्पन्न करूँगा तब दीक्षा की इच्छा। ’’

पात्रता होने पर दिक्षा संभव है patrata hone per Diksha sambhav hai&rdquo पर एक विचार;

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