शब्दों का भी अपना सामर्थ्य होता है shabdon ka bhi apna Samarth hota hai

एक दिन रात्रि में रामकृष्ण प्रवचन दे रहे थे। काफी लोग इकट्ठे थे सभा में। उन्होंने ओम् पर चर्चा शुरू कर दी। वे ध्वनि – विज्ञान पर प्रकाश डालने लगे ।

प्रवचन के बीच एक पंडित बोला , ‘ ठहरें , आप इतनी देर से ओंकार शब्द की महिमा गाए जा रहे हैं। शब्दों में क्या रखा है ? ओंकार तो एक शब्द है। उससे आत्म-ज्ञान कैसे संभव है ? ‘

उसने अनेक शास्त्रों के उदाहरण दिए। आधे घंटे तक वह बोलता गया। इसी बीच रामकृष्ण हटात् बोले , ‘ चुप रह उल्लू के पट्ठे ! अब अगर एक शब्द भी बोला तो ठीक ना रहेगा । ‘

रामकृष्ण ने गाली दी और पंडित तमतमा गया। शरद ऋतु थी , पर वह पसीना – पसीना हो गया। उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गई , पर चारों और रामकृष्ण के भक्त बैठे थे , अतः वह बोल न पाया। राम कृष्ण पुनः ओंकार की व्याख्या करने लगे।

दस मिनट पश्चात् उन्होंने उसी पंडित की ओर इशारा कर कहा , ‘ पंडित , माफ करना। गाली तो मैंने इसलिए दी थी ताकि तुम्हें बोध हो सके कि शब्द का भी अपना सामर्थ्य है ।

तुम तो बिल्कुल ही तमतमा गए और मरने – मारने पर उतारू हो गए । हकीकत तो यह है कि मेरे भक्त मौजूद हैं , अन्यथा तुम मेरी हड्डियां ही तोड़ देते। पंडित ! जरा सोचो , ‘ उल्लू के पट्ठे ‘ जैसे पदप्रयोग का इतना असर हो सकता है। तो ओंकार का कितना प्रभाव होगा ?

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s