मृत्यु का बोध mrutyu ka bodh

एक युवक सद्गुरु बायजीद के पास वर्षों से जाया करता था। वह आश्चर्यचकित था , उनके पवित्र आचरण को देखकर । एक दिन उसने पूछ लिया , ‘ भंते ! मैं वर्षों से आपको देख रहा हूं । अब तक मुझे आपमें एक भी दोष दिखाई नहीं दिया । मन में इस बात का विश्वास है कि आखिर एक इंसान इतना निर्दोष और पवित्र कैसे हो सकता है ? ‘

बायजीद मौन रहे , लेकिन युवक बार-बार प्रश्न पूछता रहा। पता नहीं क्यों ? एक दिन बायजीद ने युवक की हस्त-रेखा देखी और चेहरे को उदास करते हुए बोले , ‘ युवक , तेरी उम्र की रेखा कट गई है । कल सुबह सूर्योदय होगा और तुम्हारे जीवन का सूर्यास्त हो जाएगा । ‘

युवक घबराकर तत्काल खड़ा हो गया। उसने कहा , ‘ मुझे घर जाने दें।

सद्गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा , ‘ वत्स ! इतनी जल्दी क्या है ? कल सुबह होने को अभी काफी देर है। बैठो , तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भी दे देता हूं । ‘

युवक ने कहा , ‘ कृपया रहने दें उत्तर को । मेरे तो हाथ – पैर कांप रहे हैं और आंखों के सामने धुंध छाई रही है । ‘

उधर बायजीद की भविष्यवाणी से उसके परिवार में सन्नाटा छा गया। सभी को ज्ञात था कि बायजीद का वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता । युवक रात भर जागृत रहा ,सचेष्ट रहा।

पौ फट चुकी थी। युवक का जीवन – दीप आखिरी टिमटिमाहट ले रहा था। सब आतंकित और आशंकित थे। तभी बायजीद पहुंचे। युवक से कहा , ‘ प्रिय ! आंख खोलो । ‘

युवक नेआंख खोली , पर तब तक उसके बाहृ संस्कार लीन हो गए थे । युवक बायजीद को भी पहचान न पा रहा था। उन्होंने कहा , ‘ मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने आया हूं । ‘

युवक ने कहा , ‘ रहने दे अब उत्तर को । अब प्रश्न आपका और मेरा नहीं है अपितु जीवन के अस्तित्व का है। बशर्ते ! मैं मौत नहीं ,मुक्ति चाहता हूं।

सद्गुरु ने कहा , ‘ तुम्हारे प्रश्न का यही तो उत्तर है। मैंने कहा था , ‘ तुम्हारे जीवन की रेखा कट गई है। यह महज एक मजाक थी। यह बताने के लिए कि मौत सम्मुख हो तो जीवन से पाप खो जाता है। मृत्यु का बोध , जीवन को पवित्रता की सुवास से भर देता है । ‘

युवक ने कहा , ‘ बशर्ते ! मैं समझ चुका हूं , आपके जीवन की पवित्रता का रहस्य। जो अगले पल में मौत निहारता है , वही जीवन की पवित्रता को बरकरार रख सकता है। ‘

सद्गुरु मुस्कुराए और अपनी कुटिया की ओर रवाना हो गए ।

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