हम सभी आशा पर जीते हैं ham sabhi Asha per jite Hain

सभी भिक्षु एकत्र थे। परस्पर चर्चा के दौरान एक ने कहा , ‘ सारा नगर बुद्ध के प्रवचन में उपस्थित हुआ है , लेकिन राजपुरोहित कट्टरपंथी है , इसीलिए वह कभी भी प्रवचन सभा में नहीं आया है । हमें ऐसी कोशिश करनी चाहिए ताकि राजपुरोहित अह्रत् की सन्निधि में उपस्थित हो। ‘

कोई कुछ न बोला। सभी जानते थे कि राजपुरोहित कट्टर सांप्रदायिक है , तो साथ ही क्रूर स्वभावी भी है । वह करुणा के द्वार पर उपस्थित नहीं हो सकता । विज्ञानभिक्षु ने कहा , ‘ मैं प्रस्तुत हूं इस सेवा के लिए । अगर प्रभु आज्ञा दे तो मैं राजपुरोहित को सन्निधि उपस्थित कर सकता हूं । ‘

प्रभु ने स्वीकृति दे दी । विज्ञानभिक्षु ने प्रयत्न प्रारंभ कर दिया। राजपुरोहित के घर विज्ञानभिक्षु आहार के लिए गए , लेकिन उसने भिक्षु को देखते ही द्वार बंद कर दिया।

भिक्षु दूसरे दिन फिर गए। राजपुरोहित द्वार पर ही खड़ा था। जैसे ही भिक्षु को देखा उसने द्वार बंद कर दिया। ऐसे आठ माह बीत गए। भिक्षु प्रतिदिन राजपुरोहित के घर जाते लेकिन उनके पहुंचते ही द्वार बंद कर दिया जाता। भिक्षु प्रतिदिन इस आशा से राजपुरोहित के द्वार पर पहुंच जाते कि आज नहीं तो कल उन्हें आहार जरूर मिल जाएगा।

एक दिन राजपुरोहित नगर के बाहर जाने वाला था। उसने पत्नी से साफ-साफ कह दिया , ‘ मेरे जाने के बाद अगर बाहर भिक्षु आहार के लिए आए तो कुछ ना देना । यह सब भ्रष्ट मुंड है। अगर उसको कुछ दिया तो मुझसे बुरा कोई और न होगा ।

राजपुरोहित चला गया। ठीक समय पर विज्ञानभिक्षु तो आहार के लिए पहुंचे। राजपुरोहित की पत्नी चाहते हुए भी कुछ ना दे पाई। उसे क्षोभ था राजपुरोहित के व्यवहार पर और करुणा थी संत के व्यवहार पर । उसने विज्ञानभिक्षु से कहा , ‘ भिक्षु ! मैं देखती हूं , तुम रोज हमारे द्वार पर आते हो , पर मैं विवश हूं कुछ न देने के लिए। यहां तुम्हें कुछ भी मिलने वाला नहीं है , भिक्षु ! कहीं और चले जाया करो। ‘

भिक्षु ने कहा , ‘ साधुवाद ‘ ! मैं आशा पर जीता हूं । कल तक तो द्वार बंद था , वह आज खुला मिल गया। संभव है , कल आहार भी मिल जाए। ‘

भिक्षुउपवन की ओर रवाना हो गए । मार्ग में राजपुरोहित मिला । उसने पूछा , ‘ मुण्ड ! क्या मेरे घर में तुम्हें कुछ मिला ?

भिक्षु ने कहा , ‘ हां , मिला। ‘

राजपुरोहित आगबबूला होकर घर पहुंचा । वह पत्नी से डांट – डपट करने लगा , लेकिन पत्नी ने सौगंध खाकर कह दिया कि मैंने भिक्षु को कुछ भी नहीं दिया ।

तो क्या भिक्षु मुझसे झूठ बोला ? सम्राट कहा करते हैं कि बुद्ध के शिष्य कभी झूठ नहीं बोला करते । अभी जाता हूं प्रवचन सभा में और सम्राट के सामने यह सिद्ध कर दूंगा कि भिक्षु झूठ बोला करते हैं। ‘

प्रवचन समाप्त होने पर राजपुरोहित ने भरी सभा में बुद्ध से पूछा , ‘ आप कहां करते हैं कि भिक्षु कभी झूठ नहीं बोला करते , लेकिन विज्ञानभिक्षु ने आज झूठ बोला है । मेरे घर उसे कुछ न मिला , फिर भी उसने कहा , ‘ मिला है।’

बुद्ध ने विज्ञानभिक्षु को बुलवाया और पूछा , ‘जब राजपुरोहित घर तुम्हें कुछ भी न मिला तो तुमने कैसे कहा कि मुझे मिला है ? ‘

‘ नहीं भन्ते ! मैंने झूठ नहीं बोला ।’

‘ तो बताओ , तुम्हें क्या मिला ? ‘

‘ भन्ते ! ‘ ना ‘ का उत्तर । ‘

वहां लोगों ने देखा कि राजपुरोहित के पैरों तले जमीन खिसक रही थी।

राजपुरोहित लज्जित भी हुआ और प्रभावित भी। भिक्षु की समता और सहनशीलता ने राजपुरोहित को बुद्ध का शिष्य बना दिया था।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s