अनाथ anath

श्रमण अनाथी , नगर के बाहर उपवन में थे युवा अवस्था , भरपूर चैतन्य शक्ति और ऊर्जा का आध्यात्मिक प्रयोग वर्षों की साधना को घंटों में पूर्ण कर रहे थे।

एक दिन उपवन में सम्राट श्रेणिक पहुंचे । मुनि के दमकते हुए चेहरे और उभरते हुए यौवन से श्रेणिक विस्मय -विमुग्ध हो उठे। सोचने लगे ,यह सौंदर्य भोग के लिए है या योग के लिए है ?

सन्यासी होने का अर्थ यह तो नहीं है कि जीवन के साथ ही अन्याय किया जाए। श्रेणिक मुनि के पास पहुंचे । पूछा ‘ इस तरह यौवन अवस्था में गृह – त्याग कर सन्यास अपनाने की सार्थकता क्या है ? मुनि ! यह यौवन , भोगों को भोगने के लिए है । तुम उसे क्षीण कर रहे हो । ‘

मुनि ने कहा , ‘ नहीं ! मैं ऊर्जा का सदुपयोग कर रहा हूं । वह व्यक्ति भला साधनाओं की पराकाष्ठाओं को कैसे छू पायेगा जो अपना यौवन संसार को सौंपता है और बुढ़ापा परमात्मा को।

राजन ! जितनी उर्जा भोग के लिए चाहिए , उससे सौ -गुनी ऊर्जा योग के लिए भी आवश्यक है । ‘

सम्राट सकपका गया । पूछने लगा ‘ मुनिवर ! क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं । ‘

मुनि ने कहा , ‘ अनाथी । ‘

अनाथी ! बड़ा विचित्र नाम है। मुनिवर , अगर आपका कोई नाथ न हो तो मैं होने को तैयार हूं। आप मेरे साथ महलों में चलें , मैं आपको सारी सुविधाएं दूंगा । जिनकी आपको आवश्यकता होगी । ‘

निर्गृन्थ ने कहा ‘ राजन् ! जो स्वयं अपना नाथ नहीं है , वह भला औरों का नाथ कैसे हो पाएगा ? जिन लोगों के बीच तुम घिरे हो , जिनसे तुम्हारी लालसा और तृष्णा है और जिनसे तुम सम्मोहित हो , वे सब तब तक तुम्हारा साथ निभाने वाले हैं , जब तक तुम्हारे पास सत्ता और संपत्ति है । आज तुम सबके नाथ कहलाते हो । याद रखो , जब पिंजरे से पंछी उड़ जाएगा , तब न तुम किसी के साथ रहोगे न तुम्हारा कोई नाथ रहेगा। तुम अनाथ रहोगे , निपट अकेले ।

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