हर परिणाम के पीछे कोई कर्म जरूर होता है Har parinaam ke piche koi karma jarur hota hai


कोई कितना भी आधुनिक हो जाए , कभी ना कभी भगवान , भाग्य जैसी बातों में विश्वास करता ही है। बड़े-बड़े आधुनिक लोगों को किस्मत के भरोसे देखा गया है। किस्मत को मानना अलग बात है और भाग्य के भरोसे बैठना दूसरी बात है। हमारे निजी विचार ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। आप जैसा सोचते हैं , जैसा मानते हैं व्यक्तित्व वैसा ही बनता जाता है। हमारे विचारों की साफ झलक व्यक्तित्व में दिखाई देती है।

अगर आप भाग्यवादी हैं। किस्मत में अत्यधिक भरोसा करते हैं तो वैसा ही परिणाम आपको अपने कामों का मिलता है। अपने व्यक्तित्व को ऐसे निखारें कि उस पर कर्म का प्रभाव दिखे। इस बात को समझें कि व्यक्तित्व पर कर्म का प्रभाव प्रकाश देता है , भाग्यवाद इसे धुंधला बनाता है। कर्मवादियों के कामों के परिणाम का अनुमान आसानी से लगाया सकता है लेकिन भाग्यवाद में कर्मों के परिणाम का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।

ये सदैव याद रखें कि भाग्य कर्म से ही बनता है। हम जैसे काम करते हैं वैसा ही हमारे भाग्य का निर्माण होता है। हम अपने कर्म पर टिकें। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम कर्म तो बहुत करते हैं , लेकिन फिर भी परिणाम विपरीत आते हैं। तो लोगों को कहने का मौका मिल जाता है कि हमारी किस्मत में ऐसा ही लिखा था। दरअसल जब भी काम का परिणाम हमारे विपरीत आए तो अपने भीतर झांकिए। अतीत में देखिए कि आपने कहां चूक की थी।

हर असफलता हमारी किसी पुरानी चूक का परिणाम होती है। अगर हम गलतियों से बचते जाएं या उन्हें समय रहते सुधार लें तो फिर कभी असफलता हमारे सामने नहीं आएगी।

फिर एक बार राम के वनवास प्रसंग में चलते हैं। राम को वनवास हो चुका है। राम , सीता और लक्ष्मण तीनों वन के लिए रवाना हो चुके हैं। अभी तक राजा दशरथ इस पूरी घटना को नियति का खेल बता रहे थे। भाग्य का लिखा मान रहे थे। राम के जाने के बाद जब वे अकेले कौशल्या के कक्ष में थे तो उन्हें अपनी गलतियां नजर आने लगी। युवावस्था में श्रवण कुमार की हत्या की थी , दशरथ को याद आ गया। बूढ़े मां-बाप से उनका एकलौता सहारा छिन लिया था। उसी का परिणाम है सब।

हर परिणाम के पीछे कोई कर्म जरूर होता है। बिना कर्म हमारे जीवन में कोई परिणाम आ ही नहीं सकता। अपने कर्मों पर नजर रखें। तभी आप भाग्य को समझ सकेंगे।

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