अपने कर्म को शुद्ध कैसे करे Apne karma ko shuddh Karen

हमें अपना पुण्य छुपा कर रखना चाहिए तथा यदि हमारा पाप प्रगट हो जाय तो चिन्ता नहीं करनी चाहिए।

यदि पाप प्रगट हो तो उसका विनाश हो जाता है। परन्तु सभी लोग अपने पापों को तो छिपा कर रखते है तथा पुण्य को प्रगट कर देते है। जिससे पुण्य धीरे-धीरे क्षीण होता जाता है। तथा मन में पाप के छुपे होने के कारण वह बढ़ता जाता है तथा व्यक्ति पाप से भर जाता है। पाप प्रगट न हो जाय इस बात से सदैव चिन्तित रहते है । पाप को छुपाते हुए उसकी रातों की नींद व मन का चैन लुट जाता है तथा व्यक्ति सदैव आशंकित एवं भयभीत रहता है कि उसका पाप प्रगट न हो जाये।

हमें दुसरे की कमी तो जल्दी नजर आ जाती है परन्तु अपनी कमी नजर नहीं आती हैं। हम सदा यहीं मानते है कि हम सहीं हैं। मै जो सोचता हूं करता हूँ वहीं सत्य है। ऐसा मानना स्वयं को ही धोखा देना है। हमें अपने को दुसरे की जगह रखकर देखना व सोचना चाहिए तभी सत्य नजर आता है।

हम मनुष्य है इसलिए हमसे गलतियाँ होती ही रहती है। पाप होता ही रहता है। परन्तु अपनी गलतियों व पाप को छुपाना हमें परमात्मा से दुर कर देता है। हमें यह मानना है कि पाप हमसें होता है यह कोइ बड़ी बात नहीं यदि हमसे गलतियाँ व पाप नहीं होता हो हम भगवान बन जाते। परन्तु जाने-अनजाने पाप कर्म हो जाने पर भी तुम्हारे मन में पश्चाताप नहीं होता ।

तुम्हारी आत्मा तुम्हें नहीं कचोटती तो तुम मानव नहीं हो अपितु दानव हो। यदि दानव नहीं भी हो तो धीरे-धीरे बन जाओगे क्योंकि यदि तुम पश्चाताप नहीं करोंगे तो धीरे-धीरे पाप तुम्हें पाप महसुस नहीं होगा।

अर्थात धीरे-धीरे तुम्हारी आत्मा पाप के प्रति तुम्हें सावधान करना बंद कर देंगी। तुम्हे पाप में रस अनुभव होने लगेगा तथा कोई अन्य महापुरूष या गुरू तुम्हें  पाप के प्रति सचेत करना चाहेगा तो तुम तर्को से उसको ही गलत साबित कर दोगें।

पाप करना कोई अपराध नहीं है। परन्तु अपने पाप को स्वीकार नहीं करना अपराध है। यदि तुम अपने पाप को स्वीकार नहीं करोगें तो तुम कभी भी पश्चाताप नहीं कर पाओगे। परमात्मा को प्रार्थना करते वक्त यदि तुम बार-बार अपने किये हुए पाप को याद कर क्षमा मागोगें तो तुम्हारा मन निर्मल व शांत हो जायेगा। तथा फिर कभी तुम वह पाप करने की सोचोगे तो तुम्हारी आत्मा तुम्हे सावधान कर देगी।

धीरे-धीरे तुम पाप कर्म से दुर होने लगोगें तथा तुम्हें परमात्मा की कृपा मिलनी प्रारम्भ हो जायेगी।

पाप पहले ऑखों में आता है , इसके बाद मन में आता है , फिर धीरे-धीरे वाणी में आता है तथा उसके बाद आचरण में आता है। जैसे ही आचरण पाप कर्म बस जाय तो व्यक्ति यंत्रवत हो जाता है। तथा उसके पापकर्म का बोध समाप्त हो जाता है तथा व्यक्ति पापकर्म करता ही जाता है तथा उसे आत्मग्लानि कभी नहीं होती ।

कभी-कभी प्रारब्ध भी अजब खेल रचता है। जब पिछले जन्मों के उसके पुण्य फल उदय हो जाने पर वह पापी मनुष्य किसी परमात्मा तुल्य महापुरूष के सम्पर्क में आ जाता है तथा वह बुद्धपुरूष उस व्यक्ति की आत्मा को जाग्रत कर देता है तथा वह व्यक्ति पाप को छोडकर परमात्मा के रास्ते पर चलने लगता है तथा मुक्त हो जाता है।

ऐसे अनेंको उदाहरण है। जैसे वाल्मीकि पहले लोगों को लुटने का कार्य करते थे वह ब्रह्मऋषि बन गये तथा राम के जन्म से पहले उन्होंने रामायण लिख दी। अंगुलिमान डाकू बुद्ध की शरण में जाकर मुक्त हो गया ।

यदि तुम एकान्त में परमात्मा के सामने अपना पाप स्वीकार नहीं करोगे तो पाप का भयानक दण्ड़ मिलेगा।यदि तुम ज्यादा पापी होने से बचना चाहते हो तो परमात्मा से अपने किए की मांफी मांगो। किसी युक्त पुरूष को जो परमात्मा के निकट है उससे अपने पाप की बात बता दो ताकि तुम्हारा पाप क्षीण हो जाय।

ईसाई सम्प्रदाय में यह प्रचलित है कि व्यक्ति एकान्त में पादरी को अपने पाप बता देता है। अपने पापों के लिए क्षमा माँगता है तथा उसके मन के ऊपर जो बोझ है वह दुर हो जाता है। तब वह व्यक्ति मानसिक शांति का अनुभव करता है।

यदि तुम पाप के लिए क्षमा माँग रहे हो तो यह दर्शाता है कि तुम्हारी दृष्टि अपनी ओर है। तुम अपनी गलती को देख रहे हो और धीरे-धीरे यह आदत तुम्हे अपने अन्तरमन में उतारेगी तथा तुम परमात्मा का अनुभव कर लोगें।

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