आत्म क्रांति से ही विवेक जागरण संभव है Aatm kranti se Vivek jagran sambhav hai

बुद्ध के पास एक राजकुमार दीक्षित हो गया , दीक्षा के दूसरे ही दिन किसी श्राविका के घर उसे भिक्षा लेने बुद्ध ने भेज दिया। वह वहां गया। रास्ते में दो – तीन घटनाएं एसी घटीं , लौटते में उनसे वह बहुत परेशान हो गया।

रास्ते में उसके मन में खयाल आया कि मुझे जो भोजन प्रिय हैं , वे तो अब नहीं मिलेंगे। लेकिन श्राविका के घर जाकर पाया कि वही भोजन थाली हैं जो उसे बहुत प्रीतिकर हैं। वह बहुत हैरान हुआ। फिर सोचा संयोग होगा , जो मुझे पसंद है वही आज बना होगा। वह भोजन करता है तभी उसे खयाल आया कि रोज तो भोजन के बाद में विश्राम करता था दो घड़ी , आज तो फिर धूप में वापस लौटना है।

लेकिन तभी उस श्राविका ने कहा कि भिक्षु बड़ी अनुकंपा होगी अगर भोजन के बाद दो घड़ी विश्राम करो। बहुत हैरान हुआ। जब वह सोचता था यह तभी उसने यह कहा था , फिर भी सोचा संयोग कि ही बात होगी कि मेरे मन भी बात आई और उसके मन में भी सहज बात आई कि भोजन के बाद भिक्षु विश्राम कर ले।

चटाई बिछा दी गई , वह लेट गया , लेटते ही उसे खयाल आया कि आज न तो अपना कोई साया है , न कोई छप्पर है अपना , न अपना कोई बिछौना है , अब तो आकाश छप्पर है , जमीन बिछौना है। यह सोचता था , वह श्राविका लौटती थी , उसने पीछे से कहा: भंते! ऐसा क्यों सोचते हैं ? न तो किसी की शय्या है , न किसी का साया है। अब संयोग मानना कठिन था , अब तो बात स्पष्ट थी। वह उठ कर बैठ गया और उसने कहा कि मैं बड़ी हैरानी में हूं , क्या मेरे विचार तुम तक पहुंच जाते हैं ? क्या मेरा अंत:करण तुम पढ़ लेती हो ?

उस श्राविका ने कहा: निश्चित ही। पहले तो , सबसे पहले स्वयं के विचारों का निरीक्षण शुरू किया था , अब तो हालत उलटी हो गई , स्वयं के विचार तो निरीक्षण करते-करते क्षीण हो गए और विलीन हो गए , मन हो गया निर्विचार , अब तो जो निकट होता है उसके विचार भी निरीक्षण में आ जाते हैं।

वह भिक्षु घबड़ा कर खड़ा हो गया और उसने कहा कि मुझे आज्ञा दें , मैं जाऊं , उसके हाथ-पैर कंपने लगे। उस श्राविका ने कहा इतने घबड़ाते क्यों हैं ? इसमें घबड़ाने की क्या बात है ? लेकिन भिक्षु फिर रुका नहीं। वह वापस लौटा , उसने बुद्ध से कहा क्षमा करें , उस द्वार पर दुबारा भिक्षा मांगने मैं न जा सकूंगा। बुद्ध ने कहा कुछ गलती हुई ? वहां कोई भूल हुई ? उस भिक्षु ने कहा न तो भूल हुई , न कोई गलती , बहुत आदर-सम्मान और जो भोजन मुझे प्रिय था वह मिला , लेकिन वह श्राविका , वह युवती दूसरे के मन के विचारों को पढ़ लेती है , यह तो बड़ी खतरनाक बात है। क्योंकि उस सुंदर युवती को देख कर मेरे मन में तो कामवासना भी उठी , विकार भी उठा था , वह भी पढ़ लिया गया होगा ? अब मैं कैसे वहां जाऊं ? कैसे उसके सामने खड़ा होऊंगा ? मैं नहीं जा सकूंगा , मुझे क्षमा करें !

बुद्ध ने कहा वहीं जाना पड़ेगा। अगर ऐसी क्षमा मांगनी थी तो भिक्षु नहीं होना था। जान कर वहां भेजा है। और जब तक मैं न रोकूंगा , तब तक वहीं जाना पड़ेगा , महीने दो महीने , वर्ष दो वर्ष , निरंतर यही तुम्हारी साधना होगी। लेकिन होशपूर्वक जाना , भीतर जागे हुए जाना और देखते हुए जाना कि कौनसे विचार उठते हैं , कौन सी वासनाएं उठती हैं , और कुछ भी मत करना , लड़ना मत जागे हुए जाना , देखते हुए जाना भीतर कि क्या उठता है , क्या नहीं उठता।

वह दूसरे दिन भी वहीं गया। सोच लें उसकी जगह आप ही जा रहे हैं , और वह श्राविका आपका मन पढ़ लेती है , और वह बहुत सुंदर है , बहुत आकर्षक है , बहुत सम्मोहक है , और वह मन पढ़ लेती है आपका। हां , मन न पढ़ती होती , यह आपको पता न होता , तो फिर मन में आप कुछ भी करते , आज क्या करेंगे ? आज आप ही जा रहे हैं उसकी जगह भिक्षा मांगने , रास्ते पर आप हैं। वह भिक्षु बहुत खतरे में है , अपने मन को देख रहा है , जागा हुआ है , आज पहली दफा जिंदगी में वह जागा हुआ चल रहा है सड़क पर , जैसे-जैसे उस श्राविका का घर करीब आने लगा , उसका होश बढ़ने लगा , भीतर जैसे एक दीया जलने लगा और चीजें साफ दिखाई पड़ने लगीं और विचार घूमते हुए मालूम होने लगे। जैसे उसकी सीढ़ियां चढ़ा , एक सन्नाटा छा गया भीतर , होश परिपूर्ण जग गया। अपना पैर भी उठाता है तो उसे मालूम पड़ रहा है , श्वास भी आती-जाती है तो उसके बोध में है। जरा सा भी कंपन विचार का भीतर होता है , लहर उठती है कोई वासना की , वह उसको दिखाई पड़ रही है। वह घर के भीतर प्रविष्ट हुआ , मन में और भी गहरा शांत हो गया , वह बिलकुल जागा हुआ है। जैसे किसी घर में दीया जल रहा हो और एक-एक चीज , कोना-कोना प्रकाशित हो रहा हो। वह भोजन को बैठा , उसने भोजन किया , वह उठा , वह वापस लौटा , वह उस दिन नाचता हुआ वापस लौटा।

बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा और उसने कहा अदभुत हुई बात। जैसे-जैसे मैं उसके निकट पहुंचा और जैसे-जैसे मैं जागा हुआ हो गया , वैसे-वैसे मैंने पाया कि विचार तो विलीन हो गए , कामनाएं तो क्षीण हो गईं , और मैं जब उसके घर में गया तो मेरे भीतर पूर्ण सन्नाटा था , वहां कोई विचार नहीं था , कोई वासना नहीं थी , वहां कुछ भी नहीं था , मन बिलकुल शांत और निर्मल दर्पण की भांति था।

बुद्ध ने कहा इसी बात के लिए वहां भेजा था , कल से वहां जाने की जरूरत नहीं। अब जीवन में इसी भांति जीओ , जैसे तुम्हारे विचार सारे लोग पढ़ रहे हों। अब जीवन में इसी भांति चलो , जैसे जो भी तुम्हारे सामने है , वह जानता है , तुम्हारे भीतर देख रहा है। इस भांति भीतर चलो और भीतर जागे रहो। जैसे-जैसे जागरण बढ़ेगा , वैसे-वैसे विचार , वासनाएं क्षीण होती चली जाएंगी। जिस दिन जागरण पूर्ण होगा उस दिन तुम्हारे जीवन में कोई कालिमा , कोई कलुष रह जाने वाला नहीं है।

उस दिन एक आत्म-क्रांति हो जाती है। इस स्थिति के जागने को , इस चैतन्य के जागने को मैं कह रहा हूं–विवेक का जागरण।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s