आपकी जीत को हार में बदल सकती है थोड़ी सी अशांति Aapki jeet ko Har mein badal sakti hai thodi si Ashanti

महाभारत युद्ध में भीष्म बाणों की शैया पर लेट चुके थे। कौरव सेना का सेनापति आचार्य द्रौण को नियुक्त किया गया। द्रौण भगवान परशुराम के शिष्य थे। युद्ध में उन्हें सिवाय परशुराम और अर्जुन के कोई हरा नहीं सकता था। युद्ध में उन्होंने कई हजार सैनिकों को मार दिया। चक्रव्यूह की रचना की , जिसमें अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु मारा गया।

द्रौण को मारना बहुत मुश्किल होता जा रहा था। सक्षम होने के बाद भी अर्जुन द्रौण को नहीं रोक पा रहे थे। पांडवों के शिविर में खलबली मची हुई थी क्योंकि द्रौणचार्य पर किसी प्रकार की रणनीति या कूट नीति काम नहीं कर पा रही थी। उनके व्यक्तित्व की खास बात यह थी कि वे हर परिस्थिति में बहुत शांत दिखाई देते थे।

उनके चेहरे पर कभी कोई और भाव नहीं दिखता। जिससे उन्हें हराना बहुत मुश्किल हो रहा था। कृष्ण ने सुझाया कि आचार्य द्रौण को विचलित किए बगैर उन्हें मारना असंभव है। क्योंकि वे हड़बड़ाते नहीं है इसलिए उनसे कोई गलती नहीं होती। तब उन्होंने भीम को आदेश दिया कि कौरव सेना में शामिल अश्वत्थामा नाम के हाथी को मारकर घोषणा कर दो कि अश्वत्थामा मारा गया।

अश्वत्थामा द्रौणाचार्य का एकलौता पुत्र था। जब ये घोषणा की गई तो द्रौणाचार्य एकदम विचलित हो गए। अश्वत्थामा उन्हें प्राणों से ज्यादा प्रिय था। वे युद्ध छोड़कर रणभूमि में ध्यान लगाने बैठ गए। तभी पांडवों के सेनापति धृष्ठघुम्र ने उन्हें मार दिया।

द्रौणाचार्य का पुत्र के प्रति मोह उनकी मौत का कारण बन गया। मोह के कारण उनके मन की शांति भंग हुई और वे रणभूमि में ही ध्यान लगाने बैठ गए। जिस स्थायी शांत भाव के कारण उन्हें जितना मुश्किल लग रहा था। वो थोड़े से मोह के कारण भंग हो गया।

हमारे मन की शांति के चार शत्रु हैं।
काम , क्रोध , मोह और लोभ। ये चारों बातें मन को हमेशा अशांत करती हैं। अशांत मन कभी सफलता की ओर नहीं बढऩे देता है , यह अक्सर व्यक्ति को पीछे खींचता है। अकर्मण्यता का भाव लाता है। अगर मन को शांत रखना है तो किसी भी प्रकार के काम , क्रोध , मोह या लोभ को अपने पास फटकने ना दें। ये आपके मन में नहीं होंगे तो सफलता न केवल स्थायी होगी बल्कि दुश्मन आपको कभी हरा भी नहीं सकेंगे।

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