विश्वामित्र की कसौटी पर सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र vishwamitra ki kasauti par satyawadi raja harishchandra

राजा हरिचन्द्र को सत्यवादी राजा कहा जाता है। वह बहुत ही दानी पुरुष था। पौराणिक ग्रन्थों में भी उसकी कथा आती है। उनमें लिखा है कि वह त्रिशुंक का पुत्र था। जो भी वचन करता था उस का पालन किया करता था। सत्य , दान , कर्म तथा स्नान का पाबंद था। उसकी भूल को देवता भी ढूंढ नहीं सकते थे।

एक दिन उनके पास नारद मुनि आ गए। राजा ने उनकी बहुत सेवा की। देवर्षि नारद राजा की सारी नगरी में घूमे। नारद ने देखा कि राजधानी में सभी स्त्री-पुरुष राजा का यश तथा गुणगान करते हैं। कहीं भी राजा की निंदा सुनने में न आई।

राजा हरिचन्द्र के राज भवन से निकलकर प्रभु के गुण गाते हुए नारद इन्द्रलोक में जा पहुंचे। तीनों लोकों में नारद मुनि का आदर होता था। वे त्रिकालदर्शी थे। पर यदि मन में आए तो कोई न कोई खेल रचने में भी गुरु थे। किसी से कोई ऐसी बात कहनी कि जिससे उसको भ्रम हो जाए तथा जब वह दूसरे से निपट न ले, उतनी देर आराम से न बैठे। ऐसा ही उनका आचरण था।

इन्द्र – हे मुनिवर! जरा यह तो बताओ कि मृत्यु-लोक में कैसा हाल है जीवों का , स्त्री-पुरुष कैसे रहते हैं ?

नारद मुनि – मृत्यु-लोक पर धर्म-कर्म का प्रभाव पड़ रहा है। पुण्य , दान , होम यज्ञ होते हैं। स्त्री-पुरुष खुशी से रहते हैं। कोई किसी को तंग नहीं करता। अन्न , जल , दूध , घी बेअंत है। वासना का भी बहुत प्रभाव है। गायों की पालना होती है। घास बहुत होता है , वनस्पति झूमती है। ब्राह्मण सुख का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

इन्द्र – हे मुनि देव! ऐसे भला कैसे हो सकता है ? ऐसा तो हो ही नहीं सकता। ऐसा तभी हो सकता है यदि कोई राजा भला हो , राजा के कर्मचारी भले हो। पर मृत्यु-लोक के राजा भले नहीं हो सकते , कोई न कोई कमी जरूर होती है।

नारद मुनि – ठीक है! मृत्यु-लोक में राजा हरीशचंद्र है। वह चक्रवती राजा बन गया है। वह दान-पुण्य करता है , ब्राह्मणों को गाय देता है तथा अगर कोई जरूरतमंद आए तो उसकी जरूरते पूरी करता है , सत्यवादी राजा है। वह कभी झूठ नहीं बोलता। होम यज्ञ होते रहते हैं। राजा नेक और धर्मी होने के कारण प्रजा भी ऐसी ही है। हे इन्द्र! एक बार उसकी नगरी में जाने पर स्वर्ग का भ्रम होता है। वापिस आने को जी नहीं चाहता , सर्वकला सम्पूर्ण है। रिद्धियां-सिद्धियां उसके चरणों में हैं।

इस तरह नारद मुनि ने राजा हरीशचन्द्र की स्तुति की तो इन्द्र पहले तो हैरान हुआ तथा फिर उसके अन्दर ईर्ष्या उत्पन्न हुई। उसे सदा यही चिंता रहती थी कि कोई दूसरा उससे ज्यादा महाबली न हो। इन्द्र से महाबली वहीं हो सकता था जो बहुत ज्यादा तपस्या तथा धर्म-कर्म करता हो। ऐसा करने वाला कोई एक ही होता था। इन्द्र के पास दैवी शक्तियां थीं। वह मृत्यु-लोक के भक्तों तथा धर्मी पुरुषों की भक्ति में विघ्न डालने का प्रयत्न करता। उसने अपने मन में यह फैसला कर लिया कि वह राजा की जरूर परीक्षा लेगा , क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई इतना सत्यवादी बन जाए।

नारद मुनि इन्द्रलोक से चले गए। इन्द्र चिंता में डूब गया। अभी वह सोच ही रहा था कि उसके महल में विशवामित्र आ गया। विश्वामित्र ने कई हजार साल तपस्या की थी अब वे मृत्यु-लोक से स्वर्ग-लोक में पहुंचे थे। वे बहुत प्रभावशाली थे। उसने जब इन्द्र की तरफ देखा तो चेहरे से ही उसके मन की दशा को समझ गये।

उन्होने पूछा-देवताओं के महांदेव! महाराज इन्द्र के चेहरे पर काला प्रकाश क्यों? चिंता के चिन्ह प्रगट हो रहे हैं , ऐसी क्या बात है जो आपके दुःख का कारण है? कौन है जो महाराज के तख्त को हिला रहा है?

विश्वामित्र की यह बात सुन कर इन्द्र ने कहा – हे मुनिजन! अभी-अभी नारद मुनिजी यहां आए थे। वे मृत्यु-लोक से भ्रमण करके आए थे। उन्होंने बताया है कि पृथ्वी पर राजा हरीशचन्द्र ऐसा है जिसे लोग सत्यवादी राजा कहते हैं। वह पुण्य दान और धर्म-कर्म करके बहुत आगे चला गया है।

यह सुन कर विश्वामित्र मुस्कुराये और उसने कहा कि इस छोटी-सी बात से क्यों घबरा रहे हो। जैसा चाहोगे हो जाएगा। आप के पास तो लाखों उपाय हैं। महाराज! आप की शक्ति तक किस की मजाल है कि पहुंच जाए। आप आज्ञा कीजिए , जैसे चाहो हो सकता है , आप चिंता छोड़ें।

इन्द्र की चिंता दूर करने के लिए विश्वामित्र ने राजा हरीशचन्द्र की परीक्षा लेने का फैसला कर लिया तथा इन्द्र से आज्ञा ले कर पृथ्वी-लोक में पहुंच गया। साधारण ब्राह्मण के वेष में विश्वामित्र राजा हरीश चन्द्र की नगरी में गये। राज भवन के ‘ सिंघ पौड़ ‘ पर पहुंच कर उन्होने द्वारपाल को कहा – राजा हरीशचन्द्र से कहो कि एक ब्राह्मण आपको मिलने आया है।

द्वारपाल अंदर गया। उसने राजा हरीशचन्द्र को खबर दी तो वे सिंघासन से उठे और ब्राह्मण का आदर करने के लिए बाहर आ गया। बड़े आदर से स्वागत करके उनको ऊंचे स्थान पर बिठा कर उनके चरण धोकर चरणामृत लिया और दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना की – हे मुनिजन! आप इस निर्धन के घर आए हो , आज्ञा करें कि सेवक आपकी क्या सेवा करे ? किसी वस्तु की आवश्यकता हो तो दास हाजिर है बस आज्ञा करने की देर है।

‘ हे राजन! मैं एक ब्राह्मण हूं। मेरे मन में एक इच्छा है कि मैं चार महीने राज करूं। आप सत्यवादी हैं , आप का यश त्रिलोक में हो रहा है। क्या इस ब्राह्मण की यह इच्छा पूरी हो सकती है‌। ‘ ब्राह्मण ने कहा।

सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र ने जब यह सुना तो उनको धर्म भाव चढ़ गया। उसका रोम-रोम झूमने लगा और उन्होने दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना की – ‘ जैसे आप की इच्छा है , वैसे ही होगा। अपना राज मैं चार महीने के लिए दान करता हूं। ‘

यह सुन कर विश्वामित्र का हृदय कांप गया। उसको यह आशा नहीं थी कि कोई राज भी दान कर सकता है। राज दान करने का भाव है कि जीवन के सारे सुखों का त्याग करना था। उन्होने राजा की तरफ देखा , पर इन्द्र की इच्छा पूरी करने के लिए वह साहस करके बोले – चलो ठीक है। आपने राज तो सारा दान कर दिया , पर बड़ी जल्दबाजी की है। मैं ब्राह्मण हूं , ब्राह्मण को दक्षिणा देना तो आवश्यक होता है , मर्यादा है।

राजा हरीशचन्द्र – सत्य है महाराज! दक्षिणा देनी चाहिए। मैं अभी खजाने में से मोहरें ला कर आपको दक्षिणा देता हूं।

विश्वामित्र – ‘ खजाना तो आप दान कर बैठे हो , उस पर आपका अब कोई अधिकार नहीं है। राज्य की सब वस्तुएं अब आपकी नही रही। यहां तक कि आपके वस्त्र , आभूषण , हीरे जवाहरात आदि सब राज्य के हैं। इन पर अब आपका कोई अधिकार नहीं।

राजा हरीशचन्द्र – ‘ ठीक है। दास भूल गया था। आप के दर्शन की खुशी में कुछ याद नहीं रहा , मुझे कुछ समय दीजिए। ‘

विश्वामित्र – ‘ कितना समय ? ‘

राजा हरीशचन्द्र – ‘ सिर्फ एक महीना। एक महीने में मैं आपकी दक्षिणा दे दूंगा। ‘

विश्वामित्र – ‘ चलो ठीक है। एक महीने तक मेरी दक्षिणा दे दी जाए। नहीं तो बदनामी होगी कि राजा हरीशचन्द्र सत्यवादी नहीं है। यह भी आज्ञा है कि सुबह होने से पहले मेरे राज्य की सीमा से बाहर चले जाओ। आप महल में नहीं रह सकते। ऐसा करना होगा यह जरूरी है।

राजा हरीशचन्द्र ने शाही वस्त्र उतार दिए। बिल्कुल साधारण वस्त्र पहन कर पुत्र एवं रानी को साथ लेकर राज्य की सीमा से बाहर चले गए। प्रजा रोती बिलखती रह गई लेकिन राजा हरीशचन्द्र के माथे पर बिल्कुल भी शिकन तक न पड़ी , न ही चिंता के चिन्ह प्रगट हुए। वे अपने वचन पर अडिग रहे। साधुओं की तरह तीनों राज्य की सीमा से बाहर बनारस काशी नगरी की ओर चल दिए। मार्ग में भूख ने सताया तो कंदमूल खाकर निर्वाह किया। राजा तो न डोला लेकिन रानी और पुत्र घबरा गए। उनको मूल बात का पता नहीं था।

चलते-चलते राजा-रानी काशी नगरी में पहुंच गए। मार्ग में उनको बहुत कष्ट झेलने पड़े। पांवों में फफोले पड़ गए। वह दु:खी होकर पहुंचे पर दुःख अनुभव न किया।

राजा हरीशचन्द्र चूने की भट्ठी पर मजदूरी करने लग गए। उन्होने अपने शरीर की चिंता न की। उन्होने कठिन परिश्रम करके भोजन खाना पसंद किया। क्योंकि अपने हाथ से परिश्रम करना धर्म है और मांग कर खाना पाप है। ऐसा वही मनुष्य करता है जो मेहनत पर भरोसा रखता है। राजा परिश्रम करके जो भी लाता उससे खाने का सहारा हो जाता , लेकिन ब्राह्मण की दक्षिणा के लिए पैसे इकट्ठे न कर पाता। इस प्रकार पच्चीस दिन बीत गए। राजा के लिए अति कष्ट के दिन आ गए , क्योंकि विश्वामित्र और देवराज इन्द्र राजा हरीशचन्द्र को नीचा दिखाना चाहते थे। उन्होंने राजा के सत्यवादीता के अटल भरोसे को गिराना था।

ब्राह्मण के रूप में विश्वामित्र आ गए और क्रोधित होकर राजा हरीशचन्द्र से बोले – ‘ हे हरीशचन्द्र! आप तो सत्यवादी हैं , आप का यह धर्म नहीं कि आप धर्म की मर्यादा पूरी न करो , मेरी दक्षिणा दीजिए! ‘

राजा हरीशचन्द्र ने विश्वामित्र से क्षमा मांगी। क्षमा मांगने के बाद राजा ने फैसला किया कि वह स्वयं को तथा अपनी रानी को बेच देगा तथा जो मिलेगा वह ब्राह्मण को दे देगा , पर यह बात कतई नहीं सुनूंगा कि राजा हरीशचन्द्र झूठे हैं। वे सत्यवादी था। यह सोच कर उन्होने कांशी की गलियों में आवाज़ दी – ‘ कोई खरीद ले ‘ , ‘ कोई खरीद ले ‘, ‘ हम बिकाऊ हैं। ‘ इस तरह ही आवाज़ देते रहे। सुनने वाले लोग हैरान थे और मंदबुद्धि वाले उनकी हंसी उड़ा रहे थे।

बाजार में कई लोगों ने उनकी सहायता करनी चाही , पर राजा ने दान या सहायता लेना स्वीकार न किया। अन्त में एक ब्राह्मण ने अपनी ब्राह्मणी के लिए दासी के तौर पर रानी को खरीद लिया और राजा को पैसे दे दिए। रानी ने ब्राह्मणी के आगे दो शर्तें रखीं। एक तो पराए मर्द से न बोलना , दूसरा किसी मर्द की जूठन न खाना। ब्राह्मणी ने स्वीकार कर लिया तथा रानी अपने पुत्र को लेकर ब्राह्मण के घर चली गई।

रानी के बिक जाने के बाद राजा को शहर की श्मशान घाट के रक्षक चण्डाल ने खरीद लिया। राजा को यह कार्य सौंपा गया कि वह श्मशान घाट में रुपए लिए बिना कोई मुर्दा न जलने दे और रखवाली करे। राजा रात-दिन वहां रहने को तैयार हो गया और फिर ब्राह्मण को पूरी दक्षिणा दे दी। विश्वामित्र और इन्द्र का यह साहस न हुआ कि वह राजा हरीशचन्द्र को यह कह सके कि वह झूठा है या अपने वचन से फिर जाता है।

विश्वामित्र और इन्द्र जब हार गए तो उन्होंने अपनी हार मानने से पहले राजा और रानी की एक और कड़ी परीक्षा लेनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने अपनी दैवी शक्ति का प्रयोग करके राजा की परीक्षा ली।

राजा और रानी के पुत्र का नाम रोहतास था। वह खेलता रहता और कभी-कभी अपनी माता के काम में हाथ भी बंटाता। विश्वामित्र और इन्द्र ने अपनी दैवी शक्ति से राजा और रानी के पुत्र को सांप से डंसवा दिया। बच्चे ने उसी क्षण प्राण त्याग दिया। अपने पुत्र की मृत्यु को देख कर रानी व्याकुल हो उठी। उसका रोना धरती और आकाश में गूंजने लगा। रानी ने मिन्नतें करके अपने पुत्र के कफन और उसके संस्कार के लिए ब्राह्मण से सहायता मांगी , पर इन्द्र और विश्वामित्र ने उसके मन पर ऐसा प्रभाव डाला कि उन्होंने न दो गज कपड़ा दिया और न ही कोई पैसा दिया। रानी ने अपनी धोती का आधा चीर फाड़ कर पुत्र को लपेट लिया और श्मशान घाट की ओर ले गई।

लेकिन राजा हरीशचन्द्र ने रुपए लिए बिना रानी को श्मशान घाट में दाखिल न होने दिया और न ही अपने पुत्र का संस्कार किया। उसने अपने मालिक के साथ धोखा न किया। रानी रोती रही। वह बैठी-बैठी ऐसी बेहोश हुई कि उसको होश न रही।

संयोग से एक और घटना घटी। वह यह कि चोरों ने काशी के राजा के महल में से चोरी की। उन्होंने यह कामना की थी अगर माल मिलेगा तो श्मशान घाट के किसी मुर्दे को चढ़ावा देंगे। वे चोर जब श्मशान घाट पहुंचे तो आगे रानी बैठी थी , उसके पास मुर्दा देखकर वे रानी के गले में सोने का हार डाल कर चले गए।

चोरी की जांच-पड़ताल करते हुए सिपाही जब आगे आए तो श्मशान घाट में उन्होंने रानी के गले में सोने का शाही हार पड़ा देखा। उन्होंने रानी को उसी समय पकड़ लिया। रानी ने रो-रोकर बहुत कहा कि वह निर्दोष है , पर किसी ने एक न सुनी। उसके पुत्र रोहतास को वहीं पर छोड़ कर सिपाही रानी को काशी के राजा के पास ले गए। राजा ने उसे चोरी के अपराध में मृत्यु दण्ड का हुक्म दे दिया। मरने के लिए रानी फिर श्मशान घाट पहुंच गई। उसका वध भी राजा हरीशचन्द्र को ही करना था , जो चण्डाल का सेवक था।

विश्वामित्र ने भयानक ही खेल रचा था। पुत्र रोहतास को मार दिया , रानी पर चोरी का दोष लगा कर उसका वध करवाने के लिए वधगृह में ले आया। वध करने वाला भी राजा हरीशचन्द्र था , जिसने अपने राज्य में एक चींटी को भी नहीं मारा था। ऐसी लीला और भयानकता देख कर विष्णु और पारब्रह्म जैसे महाकाल देवता भी घबरा गए , पर राजा हरीशचन्द्र अडिग रहा। वह अपने फर्ज पर खरा उतरा। उसने अपनी रानी को मरने के लिए तैयार होने को कहा , ताकि वह उसे मार कर राजा के हुक्म की पालना कर सके। उस समय वधगृह और श्मशान घाट में वह स्वयं था और साथ में उसकी प्यारी रानी और मृत पुत्र। बाकी सन्नाटा और अकेलापन था।

‘ तैयार हो जाओ ‘! यह कह कर राजा हरीशचन्द्र ने तलवार वाला हाथ रानी को मरने के लिए ऊपर उठाया। हाथ को ऊंचा करके जब वार करने लगा तो उस समय अद्भुत ही चमत्कार हुआ। उसी समय किसी अनदेखी शक्ति ने उसके हाथ पकड़ लिए और कहा – ” धन्य हो तुम राजा हरीशचन्द्र सत्यवादी! ” इस आवाज़ के साथ ही उसके हाथ से तलवार नीचे गिर गई , उसने आश्चर्य से देखा कि वह एक श्मशान घाट में नहीं बल्कि एक बाग में खड़ा है , जहां विभिन्न प्रकार के फूल खिले हैं। उसके वस्त्र भी चण्डालों वाले नहीं थे , उसने अपनी आंखें मल कर देखा तो सामने भगवान खड़े थे। विश्वामित्र और इन्द्र भी निकट खड़े थे। पर वह ब्राह्मण कहीं नजर नहीं आ रहा था।

राजा हरीशचन्द्र उसी पल भगवान के चरणों में झुक गया। रानी ने भी आगे होकर सब को प्रणाम किया। उस समय भगवान ने वचन किया – ‘ राजा हरीशचन्द्र! सत्यवादी है। मांग , जो कुछ भी मांगोगे वही मिलेगा।

इसके साथ ही विश्वामित्र ने सारी कथा सुना दी तथा राजा रानी के पुत्र रोहतास को हंसते मुस्कराते हुए दोनों के पास पेश किया। सारी कथा सुन कर राजा हरीशचन्द्र ने भगवान , इन्द्र तथा विश्वामित्र को प्रणाम किया और कहा – ‘अपनी लीला को तो आप ही जाने महाराज! ‘

जब भगवान ने बहुत जोर दिया तो राजा हरीशचन्द्र ने यह वर मांगा – ‘ प्रभु! मेरी यही इच्छा है कि मैं सारी नगरी सहित स्वर्गपुरी को जाऊं। ‘

‘ तथास्तु ‘ कह कर सभी देवता लुप्त हो गए। राजा , रानी अपने पुत्र सहित अपनी नगरी में आ गए। सारी प्रजा ने खुशी मनाई।

कहते हैं राजा कुछ समय राज करता रहा तथा एक समय ऐसा आया जब सारी नगरी सहित राजा स्वर्गलोक को चल पड़ा। जब वह बैकुण्ठ धाम को जा रहा था। तो जानवर , पक्षी तथा पशु आदि साथ थे। यह देखकर राजा को अभिमान हो गया। उसी समय नगरी जाती-जाती धरती व स्वर्ग के बीच ब्रह्मांड में रुक गई। उसका नाम हरिचंद उरी है। गुरुबाणी में आता है।

इस कथा का परमार्थ यह है कि किसी क्षण भी सत्य को हाथ से नहीं छोड़ना चाहिए तथा न ही अभिमान करना चाहिए। जो सत्यवादी बने रहते है , उनकी नैया पार होती है। 

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