पंचतत्वों का स्थूल शरीर और मन panchatatva ka stool sharir aur man

हमारा यह शरीर पंच तत्वों से मिलकर बना है – आकाश , वायु , अग्नि , जल , धरती।
शरीर जब नष्ट होता है तो उसके भीतर का आकाश , आकाश में लीन हो जाता है , वायु भी वायु में समा जाती है। अग्नि में अग्नि और जल में जल समा जाता है। अंत में बच जाती है राख , जो धरती का हिस्सा है। इसके बा‍द में कुछ है , जो बच जाता है उसे कहते हैं आत्मा। आत्मा कभी नहीं मरती।

जन्म और मृत्यु के बीच में जिंदगी मानी गई है लेकिन जिंदगी तो मरने के बाद भी जारी रहती है। जन्म और मृत्यु के बीच जो सबसे बड़ी कड़ी है वह है आत्मा। आत्मा शरीर में है तो संसार है और आत्मा ने शरीर को छोड़ दिया , तो पारलौकिक संसार है। विज्ञान के लिए जन्म और मृत्यु के बीच की कड़ी आत्मा सबसे उलझा रहस्य है।


इस आत्मा से जब स्थूल शरीर छूट जाता है या इसका स्थूल शरीर जलकर नष्ट हो जाता है , तब भी उसके पास दो चीजें बच जाती हैं जिसे मन और सूक्ष्म शरीर कहते हैं। शरीर तो भौतिक जगत का हिस्सा है , लेकिन मन अभौतिक है। यह मन ही आत्मा के साथ आकाशरूप में विद्यमान रहता है। इस मन में उसकी बुद्धि , सभी स्मृतियां और अनुभव संरक्षित रहते हैं। मृत्यु के बाद आत्मा सूक्ष्म शरीर में रहकर अगले जन्म मिलने का इंतजार करते रहती है।
इस इंतजार में कुछ आत्मा भूत बनकर भटकती है , तो कुछ गहरी सुषुप्ति अवस्था में रहती है , कुछ पितृलोक चली जाती है और कुछ देवलोक। लेकिन सभी को फिर से धरती पर पुन: किसी पशु , पक्षी या मनुष्य की योनि प्राप्त करने के लिए लौटना होता। जिसके जैसे कर्म और विचार उसको मिलते हैं , वैसी योनि। जन्म , मृत्यु और फिर से जन्म का यह चक्र तब तक चलता रहता है , जब तक ‍कि आत्मा मोक्ष प्राप्त न कर ले। मोक्ष प्राप्त आत्मा ब्रह्मलोक में स्थिर रहती है।


कर्म और पुनर्जन्म एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कर्मों के फल के भोग के लिए ही पुनर्जन्म होता है तथा पुनर्जन्म के कारण फिर नए कर्म संग्रहीत होते हैं। इस प्रकार पुनर्जन्म के दो उद्देश्य हैं –
पहला , यह कि मनुष्य अपने जन्मों के कर्मों के फल का भोग करता है जिससे वह उनसे मुक्त हो जाता है।
दूसरा , यह कि इन भोगों से अनुभव प्राप्त करके नए जीवन में इनके सुधार का उपाय करता है जिससे बार-बार जन्म लेकर जीवात्मा विकास की ओर निरंतर बढ़ती जाती है तथा अंत में अपने संपूर्ण कर्मों द्वारा जीवन का क्षय करके मुक्तावस्था को प्राप्त होती है।


जिस प्रकार इस संसार में आपाधापी और धक्का देकर अवसर छीन लेने की होड़ है उसी प्रकार सूक्ष्म जगत में धक्का देकर दुष्टात्मा श्रेष्ठ गर्भ छीन लेती है जिससे कोई दुष्ट चरित्र व्यक्ति किसी कुलीन और संस्कारित परिवार में जन्म ले लेता है , कोई गाली-गलौज करने वाला बालक अच्छे और कुलीन गर्भ में जन्म ले लेता है वहीं किसी असभ्य कुसंस्कारित माता के गर्भ से कोई शांत बालक जन्म ले लेता है।


आपको यह भी जानना चाहिए कि आत्मा मृत्यु के तुरंत बाद नया जन्म नहीं लेती है। कुछ सालों के बाद जब स्थिति अनुकूल होती है तभी आत्मा नए शरीर में प्रवेश करती है।

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