धर्मसाधना के मार्ग में आगे बढ़ने के लिए सानुकूल परिवार का होना बहुत जरूरी है Dharm Sadhna ke Marg mein aage badhane ke liye Sonukul Parivar Ka hona bahut jaruri hai

विमल मंत्री नि:संतान थे। एक और उन्हें संतान की कामना थी तो दूसरी और उनके दिल में आबू के पर्वतों पर देवाधिदेव वीतराग परमात्मा का भव्यातिभव्य जिन मंदिर के निर्माण की अदम्य लालसा थी। अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए अंबिका देवी की आराधना की। देवी ने कहा , ‘ विमल ! तेरा भाग्य अपूर्ण… अधिक पढ़ें धर्मसाधना के मार्ग में आगे बढ़ने के लिए सानुकूल परिवार का होना बहुत जरूरी है Dharm Sadhna ke Marg mein aage badhane ke liye Sonukul Parivar Ka hona bahut jaruri hai

अर्जुन का युद्ध अपने ही पुत्र के साथ क्यों हुआ Arjun ka yuddh Apne hi Putra ke sath kyon hua

अर्जुन ने अपने-आपको श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया था। अर्जुन होते हुए भी , नहीं था , इसलिए कि उसने जो कुछ किया , अर्जुन के रूप में नहीं , श्रीकृष्ण के सेवक के रूप में किया। सेवक की चिंता स्वामी की चिंता बन जाती है। अर्जुन का युद्ध अपने ही पुत्र बब्रुवाहन के साथ… अधिक पढ़ें अर्जुन का युद्ध अपने ही पुत्र के साथ क्यों हुआ Arjun ka yuddh Apne hi Putra ke sath kyon hua

महाबली अंगद ने बताए रावण को मृत्यु के प्रकार Mahabali Angad ne bataen Ravan ko mrutyu ke prakar

राम-रावण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण से कहा – तू तो मरा हुआ है , मरे हुए को मारने से क्या फायदा ? रावण बोला – मैं जीवित हूँ , मरा हुआ कैसे ? अंगद बोले , सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते – साँस तो लुहार का धौंकनी भी… अधिक पढ़ें महाबली अंगद ने बताए रावण को मृत्यु के प्रकार Mahabali Angad ne bataen Ravan ko mrutyu ke prakar

सम्राट भरत को आत्म – कल्याण के सिवा कुछ भी नजर नहीं आता Samrat Bharat ko aatm – Kalyan ke Siva kuchh bhi najar Nahin aata

जिस महान व्यक्ति के नाम पर हम अपने देश को भारत कहते हैं , घटना उसी से सम्बध्द है। कहते हैं कि सम्राट भरत एक दफा तीर्थंकर आदिनाथ की सेवा में बैठे थे। चर्चाएं चल रही थी। चर्चा के दौरान ही भरत ने अपने पिता आदिनाथ से पूछा कि प्रभु , मृत्यु के बाद मेरी… अधिक पढ़ें सम्राट भरत को आत्म – कल्याण के सिवा कुछ भी नजर नहीं आता Samrat Bharat ko aatm – Kalyan ke Siva kuchh bhi najar Nahin aata

परनारी पर कुदृष्टि डालना अपने ही तप पूंजी को नष्ट करना है Pernari per Ku Drishti dalna Apne hi tap punji ko nasht karna hai

अध्यात्म विज्ञान के सिद्धांतों के अंतर्गत एक नियम यह भी है कि “ तप से तेज की उत्पत्ति होती है ”। यह बात सतयुग में जितनी सार्थक थी , उतनी ही आज भी सार्थक है । साधना के साथ जो संयम और नियम के कड़े प्रतिबंध लगाये गये है , वह तप के ही साधन… अधिक पढ़ें परनारी पर कुदृष्टि डालना अपने ही तप पूंजी को नष्ट करना है Pernari per Ku Drishti dalna Apne hi tap punji ko nasht karna hai

आपकी जीत को हार में बदल सकती है थोड़ी सी अशांति Aapki jeet ko Har mein badal sakti hai thodi si Ashanti

महाभारत युद्ध में भीष्म बाणों की शैया पर लेट चुके थे। कौरव सेना का सेनापति आचार्य द्रौण को नियुक्त किया गया। द्रौण भगवान परशुराम के शिष्य थे। युद्ध में उन्हें सिवाय परशुराम और अर्जुन के कोई हरा नहीं सकता था। युद्ध में उन्होंने कई हजार सैनिकों को मार दिया। चक्रव्यूह की रचना की , जिसमें… अधिक पढ़ें आपकी जीत को हार में बदल सकती है थोड़ी सी अशांति Aapki jeet ko Har mein badal sakti hai thodi si Ashanti

ध्रुवतारे की निस्वार्थ भक्ति की प्रेरणादायक कथा Dhruv tare ki niswarth bhakti ki prernadayak katha

राजा उत्तानपाद ब्रह्माजी के मानस पुत्र स्वयंभू मनु के पुत्र थे। उनकी सनीति एवं सुरुचि नामक दो पत्नियाँ थीं। उन्हें सुनीति से ध्रुव एवं सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र प्राप्त हुए। वे दोनों राजकुमारों से समान प्रेम करते थे। यद्यपि सुनीति ध्रुव के साथ-साथ उत्तम को भी अपना पुत्र मानती थीं , तथापि रानी सुरुचि… अधिक पढ़ें ध्रुवतारे की निस्वार्थ भक्ति की प्रेरणादायक कथा Dhruv tare ki niswarth bhakti ki prernadayak katha

नफरत या अत्याचार कभी प्रेम को समाप्त नहीं कर सकते Nafrat yah atyachar Kabhi prem ko samapt Nahin kar sakte

महावीर स्वामी तपस्या में लीन थे। एक दुष्ट उनके पीछे लग गया। कई बार उसने महावीर स्वामी का अपमान किया , लेकिन वे सदैव शांत ही रहते। उन्होंने तो संसार को प्रेम का पाठ पढ़ाया था। वे कहते थे सदा प्रेम करो , प्रेम में ही परमतत्व छिपा है। जो तुम्हारा अहित करे उसे भी… अधिक पढ़ें नफरत या अत्याचार कभी प्रेम को समाप्त नहीं कर सकते Nafrat yah atyachar Kabhi prem ko samapt Nahin kar sakte

शस्त्र और शास्त्र के महारथी – परशुराम shastra aur shastra ke maharathi – parshuram

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जिनका सादर नमन करते हों , उन शस्त्रधारी और शास्त्रज्ञ भगवान परशुराम की महिमा का वर्णन शब्दों की सीमा में संभव नहीं। वे योग , वेद और नीति में निष्णात थे , तंत्रकर्म तथा ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में भी पारंगत थे , यानी जीवन और अध्यात्म की हर विधा… अधिक पढ़ें शस्त्र और शास्त्र के महारथी – परशुराम shastra aur shastra ke maharathi – parshuram

महाकालेश्वर की कथा mahakaleshwar ki katha

उज्जयिनी में राजा चंद्रसेन का राज था। वह भगवान शिव का परम भक्त था। शिवगणों में मुख्य मणिभद्र नामक गण उसका मित्र था। एक बार मणिभद्र ने राजा चंद्रसेन को एक अत्यंत तेजोमय ‘चिंतामणि ‘ प्रदान की। चंद्रसेन ने इसे गले में धारण किया तो उसका प्रभामंडल तो जगमगा ही उठा , साथ ही दूरस्थ… अधिक पढ़ें महाकालेश्वर की कथा mahakaleshwar ki katha